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छोटी बुर का मज़ा
हेलो दोस्तो आपका राज शर्मा आपके लिए एक ओर स्टोरी लेकर हाजिर है ये कहानी बहुत ही मजेदार है कहते हैं किसी लड़की को गैर मर्द के साथ अकेला नहीं चोरना चाहिए. क्योकि मर्द उसे पकड़ कर छोड़ने की ही सोचेगा. कैसे इसके बर में अपना लंड डाल डून - यही ख़याल उसके मान मैं कुलबुलाएगा. दोस्तों मेरे साथ ऐसा ही हुआ. एक दिन मैं अपने घर में अकेला था. बीवी मैके गयी हुई थी और बच्चे गये थे स्कूल. मैने
घर में कुछ ज़रूरी काम करने के लिए ऑफीस से च्छुतटी ले रखी थी. करीब 11.00 बजे दरवाज़े पर हुआ टिंग तोंग! दरवाज़ा खोला तो सामने मानो एक अप्सरा खरी थी. 28-29 साल की ग़ज़ब की सावली और सुंदर औरत सारी पहने हुए और हाथों में काग़ज़ और कलाम लिए हुए कोयल की आवाज़ में बोली, " माफ़ कीजिएगा, क्या बहनजी हैं ?" मैने कहा, "जी नहीं, इस वक़्त तो सिर्फ़ मैं हून. आप कौन हैं ?" उसके सर पर पसीने की कुछ बूंदे थी. वो
बोली "ज़रा एक ग्लास पानी मिलेगा ?" मैने कहा, "हन, क्यों नहीं ?" वो ज़रा सा अंदर आई. मैने पानी का ग्लास देते हुए पूछा, "क्या बात है, आप हैं कौन ?" पानी पी कर वो बोली, "जी मैं एक सर्वे पर हून. क्या आप मेरे कुछ प्रश्नों का जवाब दे देंगे ?" मैने कहा, "जी कोशिश कर सकता हून. आप प्लीज़ यहाँ बैठ जाइए." वो सोफे पर बैठ गयी और हमारे घर का दरवाज़ा अभी खुला ही था. मैने दूसरे सोफे पर बैठ कर कहा, "हन, पूछिए." वो
बोली,"जी मुझे एक कन्ज़्यूमर कंपनी ने भेजा है सर्वे के लिए. आप लोग अपने घर की ज़रूरत की चीज़ों को कहाँ से खरीदते हैं ?" इस तरह वो सवाल पर सवाल पूछती रही और मैं जवाब देता गया. हमारे कमरे की बड़ी खिड़की से तेज हवा आ रही थी और दरवाज़ा काफ़ी हिल रहा था. कुछ देर बाद मैने पुचछा, "इस तरह के वेदर में भी आप क्या सब घरों में जा कर सर्वे करती हैं ?" "जी, जॉब तो जॉब ही है ना." "तो आप शादी शुदा हो कर
(उसके माथे पर सिंदूर था) भी जॉब कर रही हैं ?" अब वो बी थोड़ी सी खुल सी गयी. बोली, "क्यों, शादी शुदा औरत जॉब नहीं कर सकती ?" "जी यह बात नहीं, घर घर जाना, जाने किस घर में कैसे लोग मिल जाएँ ?" उसने जवाब दिया, "वैसे तो दिन के वक़्त ज़्यादातर हाउसवाइफ ही मिलती है. कभी कभी ही कोई माले मेंबर होता है." "तो आपको दर नहीं लगता." "जी अभी तक तो नहीं लगा. फिर आप जैसे शरीफ आदमी मिल जाए तो क्या दर ?" शरीफ आदमी -
एक बार तो सुन कर अजीब लगा. इसे क्या मालूम मैं इसे किस नज़र से देख रहा था. सारी पर ब्लाउस तनी हुए थे और मेरे लंड को खुजली सी होने लगी. जी चाह रहा था की काश सिर्फ़ एक बार चूम सकता और ब्लाउस के नीचे उन चुचियों को दबा सकता. हाथों की उंगलियाँ लंबी लंबी मुलायम सी. देख देख कर लंड महाराज खरे ही हो गये. मान में ज़ोरों से ख़याल आ रहा था , क्या ग़ज़ब की अप्सरा है. इसकी तो छूट को हाथ लगते ही शायद
हाथ जल जाएगा. तभी वो बोली, "अक्चा, थॅंक्स फॉर एवेरितिंग. मैं चलती हून." मानो पहाड़ टूट गया मेरे उपर. चली जाएगी तो हाथ से निकल ही जाएगी. अर्रे विजय साहब, हिम्मत करो, आयेज बढ़ो, कुछ बोलो ताकि रुक जाए. इसके बर में अपना लंड नहीं डालना है क्या ? बर में लंड ? इस ख़याल ने बड़ी हिम्मत दी. "माफ़ कीजिएगा, अगर आप बुरा ना माने तो अपना नाम तो बता दीजिए ?" मैने डरते हुए कहा. कोयल सी आवाज़ में बोली,
"इसमे बुरा मानने की क्या बात है. प्रतिमा. प्रतिमा स्रिवास्तवा." "प्रतिमजी, आप जैसी सुंदर औरत को तोड़ा केर्फुल रहना चाहिए." "सुंदर ?" मैं तोड़ा सा घबराया, लेकिन फिर हिम्मत कर बोला, "जी, सुंदर तो आप है ही. बुरा मत मानीएगा. आप प्लीज़ अब तो छाए पी कर ही जाइए." "छाए, लेकिन बनाएगा कौन ?" "मैं जो हून, कम से कम छाए तो बना ही सकता हून." वो हेस्ट हुए बोली, "ठीक है, बनाइए." मैने हवा में हिलते दरवाज़े को
हल्के हल्के बंद कर दिया. और उसका ध्यान हटाने के लिए कहा, "आप प्लीज़ वहाँ सोफे पर बैठ जाइए. टV ओं कर लीजिए." किचन में जा कर मैने छाई के लिए बर्तन गॅस पर रखा और पानी डाला, गॅस ओं किया, फ्रिड्ज से दूध निकाला और दूध तोड़ा सा पानी में मिलाया. मैं छाई के उबलने का वेट कर रहा था. इधर मेरा लंड उबाल रहा था. इतनी सुंदर औरत पास बैठी थी और मुझे पता नहीं था कैसे आयेज बढ़ूँ. तभी वो पीछे से आई और बोली,
"क्या मैं आपकी कुछ मदद करूँ ?" मैने जवाब दिया, "बस देख लीजिए, की छाई ठीक बन रही है या नहीं." मैने अब और हिम्मत कर के कहा, "प्रतिमजी, आप वाकई में बहुत सुंदर हैं. और बहुत अच्छी भी. आपके पति बहुत ही खुशनसीब इंसान हैं." "आप प्लीज़ बार बार ऐसे ना कहिए. और मुझे प्रतिमजी क्यों कह रहे हैं. मैं तो आपसे छ्होटी हून." दोस्तों यह हिंट काफ़ी था मेरे लिए. क्योकि अगर औरत नहीं चाहे तो उसे छोड़ना बड़ा
मुश्किल है. आख़िर ह्यूम रेप तो करने नहीं है. मैं समझ गया, यह अब छुड़वाने के लिए तैयार है. "ठीक है, प्रतिमजी नहीं . प्रतिमा. तुम कितनी सुंदर हो, मैं बतयूं ?" "कहा तो है आपने कई बार. अब भी बताना बाकी है ?" "बाकी तो है." यह कह कर मैने गॅस बंद किया. "बस एक बार अपनी आखें बंद करो.. प्लीज़." उसने आखें बंद की. मैने कहा, "आँखें बंद ही रखना." और मैने उसको एल्बो के पास से पाकर कर आहिस्ते आहिस्ते कमरे में
लाया. हल्क से मैने उसके गुलाबी गुलाबी नर्म नर्म होठों पर अपने होत रख दिए. एक बिजली सी दौर गयी मेरे शरीर में. लंड एकद्ूम टन गया और पंत से बाहर आने के लिए तड़पने लगा. उसने तुरंत आखें खोली और अवाक सी मुझे देखती रही. और दोस्तों कस कर और शर्मा कर मेरी बाहों में आ गयी.. मेरी खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा. कस कर मैने उसे अपनी बाहों में दबोच लिया. ऐसा लग रहा था बस यो ही पकड़े रहूं. फिर मैने
सोचा की अब समय नहीं वेस्ट करना चाहिए. पका हुआ फल है, बस खा लो. तुरंत बाहों में मैने उसे उठाया (बहुत ही हल्की थी) और बेडरूम में ला कर बिस्तर पर लिटाया. उसने आँखें बंद कर रखी थी. बहुत शर्मा रही थी बेचारी. सारी पहने हुए बिस्तर पर लेती हुई शरमाती हुई आँखें बंद किए हुए ब्लाउस से बूब्स उपर नीचे होते हुए देख कर मैं पागल हो गया. आहिस्ते से सारी को एक तरफ कर मैने उसकी दाहिनी चुचि को उपर से
ही दबाया. एक सिहरन सी दौर गयी उसके शरीर में. बंद आँखों से ही बोली, "प्लीज़ विजय साहब, जल्दी से ! कोई आ नहीं जाए." "घबरयो नहीं, प्रतिमा डार्लिंग. बस मज़ा लेती रहो. आज मैं तुम्हे दिखला दूँगा प्यार किसे कहते हैं. खूब छोड़ूँगा मेरी रानी." मैं एकद्ूम फॉर्म में था. यह कहते हुए मैने उसकी चुचियों हो खूब दबाया और होठों को कस कस कर चूसने लगा. फिर मैने कहा, "चुड़वावगी ना ." आहा, ग़ज़ब की शरमाते
हुए बोली, "विजय साहब, आप भी .. बहुत पाजी हैं." "प्रतिं रानी, सेक्स में क्या शरमाना." और उसके नर्म नर्म गालों को हाथ में ले कर होठों का खूब रास्पान किया. मैं उसके उपर चढ़ा हुआ था और मेरा लंड उसके छूट के उपर था. छूट मुझे महसूस हो रही थी. और उसकी चुचियाँ .. ग़ज़ब की तनी हुई ... मेरे सीने में चुभ चुभ कर बहुत ही आनंद दे रही थी. दाहिने हाथ से अब मैने उसकी लेफ्ट चुचि को खूब दबाया और
एग्ज़ाइट्मेंट मैं ब्लाउस के नीचे हाथ घुसा कर उसे पकड़ना चाहा. "विजय, ब्लाउस खोल दो ना." उसका यह कहना था और मैने तुरंत उसे घुमा कर ब्लाउस के बटन्स खोले और साथ ही साथ ब्रा का हुक खोला और पीछे से ही हाथ को ब्रा के नीचे से उसके बूब्स का पूरा समेत लिया. आहा, क्या फीलिंग थी, सकत और नर्म दोनो, गर्म मानों आग हो. निपल्स एकद्ूम ताने हुए. जल्दी जल्दी ब्लाउस और ब्रा को हटाया. सारी को परे किया
और पेटिकोट के नारे को खोल कर उसे हटाया. पिंक पनटी पहने हुए नंगी लेती हुई देख कर तो मैं बर्दाश्त ही नहीं कर सका. शर्मा कर उसने अपने बूब्स को छिपाने की कोशिश की और टाँगों को क्रॉस कर के छूट को भी छिपाया. मैने अब अपने कपड़े जल्दी जल्दी उतरे. लंड टन कर बाहर आ गया और उपर की तरफ हो कर तड़पने लगा. उसका एक हाथ ले कर मैने अपने फड़कते हुए लंड पर रख दिया. "उफ़ कितना बड़ा और मोटा है", वो बोली. और
आहिस्ता आहिस्ता लंड को आयेज पीछे हिलने लगी. शादी .शुदा औरत को छोड़ने का यहीं मज़ा है. कुछ सीखना नहीं पड़ता. वो सब जानती हैं. और अगर महीने का ठीक दिन हो तो कॉंडम की भी ज़रूरत नहीं. मैने आख़िर पूछ ही लिया, "प्रतिं डार्लिंग, कॉंडम लगाऊं ?" मूह हिलाते हुए माना करते हुए हेस्ट हुए खिलखिलाई, "सब ठीक है. अभी मेनास हुआ ही था." मैने अब उसके बदन से उस पिंक पनटी को हटाया और इतमीनान से उसकी छूट
को निहारा. हल्के हल्के बॉल थे. बीच में सुंदर सा छ्होटा सा कट. कुछ फूला हुआ था. हाथ मैने उसके उपर रखे और हल्के से दबाया. उंगली ऐसे घुसी जैसे माखन मैं छुरी. रस बह रहा था और छूट एकद्ूम गीली थी. डिस्क्रिप्षन के बाहर है. मैं जैसे सब कुछ एक साथ कर रहा था. कभी उसके होठों को चूस्ता, चुचियों को दबाता - कभी एक हाथ से कभी दोनों से. एकद्ूम टाइट गोल और तनी हुई चुचियाँ. उसके सोने जैसे बदन पर कभी
हाथ फिरता. फिर मैने उसकी चुचियों को खूब चूसा और उंगलियों से उसकी बर में खूब अंदर बाहर कर हिलाया. "प्रतिमा, अब मैं नहीं रह सकता, अब तो छोड़ना ही पड़ेगा. कस कस कर छोड़ूँगा मेरी रानी." पहली बार उसके मूह से अब सुना, "छोड़ दीजिए ना विजय साहब, बस छोड़ दीजिए." मज़ा लेते हुए मैने पूछा, "क्या छोड़ूँ जाने मान. एक बार फिर से कहो ना. तुम्हारे मूह से सुनने में कितना अक्चा लग रहा है." "अब छोड़िया
नेया .. इस .. इस छूट को." "छूट नहीं, बर मेरी रानी, बर. ज़्यादा अक्चा लगता है सुनने में. अब मैं तेरी गरम गरम और गुलाबी गुलाबी बर में अपना ये लंड घुसाऊंगा और कस कस कर छोड़ूँगा." मैने अपना लंड उसके बर के मूह पर रखा और हल्के से धक्का दिया. उसने अपने हाथों से मेरे लंड को पकड़ा, और गाइड करती हुई अपनी छूट में डाल दिया. दोस्तों मानों मैं जन्नत में आ गया. मैं बोल ही उठा, "उफ़, क्या बर है प्रती. मज़ा
आ गया." अब उसने भी एग्ज़ाइट हो कर बगैर झिझके कहा, " छोड़ दो विजय बस अब इस बर को खूब छोड़ो." दोस्तों चुचियाँ दबाते हुए, होत चूस्ते हुए ज़ोर से ज़ोर छोड़ छोड़ कर ऐसा मज़ा मिल रहा था की पता ही नहीं चला कब मैं झार गया. झरते झरते भी मैं उसे बस छोड़ता ही रहा छोड़ता ही रहा. "प्रतिमा, .. बहुत टेस्टी चुदाई थी यार. तुम तो ग़ज़ब की चीज़ हो." "मुझे भी बहुत मज़ा आया, विजय साहब." वो कस मुझे पकड़ते हुए
बोली. उसकी चुचियाँ मेरे सीने से लग कर एक अलग ही आनंद दे रही थी. दोस्तों, हुँने फिर 20 मिनिट बाद, पहले तो उसके बर को छाता और उसने मेरे लंड को चूसा हल्के हल्के . और फिर हुँने कस कस कर चुदाई की. और इस बार झरने में काफ़ी समय भी लगा. मैने शायद उसकी चुचियाँ और बर और होत और गाल के किसी भी अंग को चूसे बगैर नहीं छोरा. इतना मज़ा पहले कभी नहीं आया था. बस ग़ज़ब की चीज़ थी वो. कपड़े पहनने के बाद
मैने उसे 500 रुपये दिए जो की उसने ना ना करते हुए शरमाते हुए ले लिए. और मैने पूछा, "प्रातीं, अब तो तुम्हे और कई बार छोड़ना पड़ेगा. अपने इस प्यारी सी छूट और प्यारी प्यारी चुचियों और प्यारे प्यारे होठों और प्यारी प्यारी प्रातीं डार्लिंग के दर्शन कारवावगी ना ?" मैने उसका फोन नंबर ले लिया और कह दिया की मैं बता दूँगा जिस दिन कोई घर पर नहीं होगा. अब वो मुझसे फ्री हो गयी थी, बोली, "विजय,
डॉन'त वरी, होटेल में चुड . चुड .. वाएँगे." चूमते हुए मैने उसे भेजा.
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Posted By raj007 to Hindi main mast kahaniyan on 10/01/2008 03:19:00 AM __._,_.___
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